भारत में यूँ तो महिलाओं के समुचित विकास, जनभागीदारी,उचित प्रतिनिधित्व, सुरक्षा, आरक्षण जैसे मुद्दों पर हमें लगातार बहस सुनने को मिले जाते है, लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है की इस बहस को लेकर जो लगातार आवाज उठाने का काम हमारे देश की मीडिया करती है, वहीं पर महिला के प्रति सबसे ज्यादा उदासीनता देखने को मिलती है ।वर्ष 2015 में भारतीय पत्रकारिता में महिला पत्रकारों की भागीदारी को लेकर "मीडिया स्टडीज ग्रुप" के अनुसार अगर बात किया जाए तो राष्ट्रीय स्तर पर महिला पत्रकारों की भागीदारी 17% बताया गया हैं ।अंग्रेजी माध्यम के समाचार पत्रों तथा चैनलों में महिला पत्रकारों की उपस्थिति कुछ हद तक संतोष प्रद बताया गया हैं वही हिंदी तथा क्षेत्रीय भाषा के समाचार पत्रों तथा चैनलों में इनकी उपस्थिति नगण्य के बराबर है।राज्यों के संदर्भ में अगर बात किया जाए तो 6 राज्यों तथा 2 केंद्र शासित प्रदेश (असम,झारखंड, नागालैंड,अरुणाचल प्रदेश, उड़ीसा, पांडीचेरी,तथा दमन एवं दीव) ऐसे हैं जहाँ जिला स्तर पर महिला पत्रकारों की भागीदारी शून्य है । राज्यों के संदर्भ में आन्ध्र प्रदेश की स्थिति सबसे बेहतर माना गया हैं, वही बिहार में महिला पत्रकारों की भागीदारी 9.38% है। मीडिया हाउस की अगर बात की जाए तो प्रसार भारती की All India Radio में महिला पत्रकारों की स्थिति सबसे बेहतर माना गया हैं । आज के मौजूदा समय के अनुसार ये अनुपात काफी चिंता और विचारणीय है ,क्योंकि हमें दूसरों को तभी सलाह देना चाहिए जब हम खुद उसका पालन करते हो।