मित्रों आज मैं एक घने जंगल से चार दिनों की घुटन व मशक्कत के बाद निकलने वाला हूँ । ये एक ऐसा जंगल है जहाँ पेड़ नहीं है बल्कि कंकृटों से निर्मित ये घना जंगल है ।रोशनी से जगमगाती इस जंगल में जानवर की जगह इंसानों का वास है । भीड़ भरी राहों में भी लोग खुद को अकेला पाता है । विकास की चाह ने यहां के इंसानों को मशीन में परिवर्तित कर दिया है । शायद इसी लिए यहां के इंसानों के अंदर से इंसानियत पूरी तरह समाप्त हो गई है। क्या हमें यही विकास चाहिए जो हमें अपनी जड़ों से दूर कर दे?