रविवार, 17 दिसंबर 2017

मोदी राज में बिहार के होनहार हो रहे हैं बेरोजगार  


यूं तो बिहार में रोजार को लेकर वर्षों से मारा-मारी है। प्लायन के सबसे ज्यादा मामले बिहार में ही देखने को मिलाता है। रोजी-रोजगार के लिए लोग अपनों को छोड़कर कोसों दूर रहने को विवस हैं। इन सब के बावजूद भी बिहार में प्रतिभा की कमी नहीं है। सरकारी नौकरियों में सबसे ज्यादा बिहारी युवा ही मिलेगें। लेकिन हाल के वर्षों में खास कर केंद्र में एनडीए की सरकार बनने के बाद से एक तरह से बिहारी युवा संक्रमण काल में जी रहे हैं। इसका मुख्य कारण है रेलवे सहित अन्य केंद्रीय मंत्रालियों में बहाली में रोक लगाया जाना।
बिहार के एक परीक्षाा केंद्र के बाहर छात्र (फाइल फोटो)
हिंदी के प्रति बिहारी का प्यार 
यूं तो कहने को भारत, गांवों का देश है। लेकिन बिहार के साथ यह कथन पूरी तरह से  फीट बैठता है। बिहार में आज भी लगभग अस्सी फीसदी से अधिक लोग किसी न किसी रूप में गांव से जुड़े हुए हैं। एक तो बिहार हिंदी भाषी प्रदेश है साथ ही साथ ग्रामीण पृष्ठभूमि होने के कारण यहां के छात्रों को अंग्रेजी की पढ़ाई में रूची नहीं लगती है। इसलिए यहां के अधिकांश छात्रों का हिंदी के प्रति रूची काफी अधिक है। यहीं कारण है कि बिहार में रेलवे भर्ती की तैयारी करने वाले छात्रों की संख्या काफी अधिक है।

भारतीय रेलवे (फाइल फोटो)

रेलवे के ग्रुप डी पद पर चार लाख होनी थी नियुक्तियां 
2012 में राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक आयोजित की गई थी। उस समय यूपीए का शासनकाल था। उस बैठक में रेलवे में कर्मचारियों की कमी के मद्देनजर तय किया गया था कि अगले पांच साल तक रेलवे में कर्मियों की कमी को दूर कर लिया जाएगा। इसके तहत ग्रुप डी के 4 लाख कर्मियों की बहाली होनी थी यानी की हर साल 80 हजार कर्मियों की बहाली की जानी थी। और ऐसा हुआ भी। वर्ष 2013 और 2014 में अस्सी-अस्सी हजार निकाला गया।
एनडीए सरकार के आने के बाद रूका बहाली 
वर्ष 2014 में आम चुनाव के बाद जैसे ही केंद्र की सत्ता पर एनडीएआई आई, इसने सबसे पहले रेलवे के इस बहाली को पूरी तरह रोक दिया। यानी की दो लाख चालीस हजार पदों की बहाली पर रोक लगा दी गई। ये रोक अब तक जारी है। यानी की तीन साल बाद भी रेलवे में फिर बहाली नहीं निकाली गई।

शनिवार, 30 सितंबर 2017

ये हैं IIT के प्रोफेसर आलोक सागर: 21वीं सदी महान संत

आज जब देश भर में बाबाओं के चरित्र, रहन-सहन, खान-पान एवं उनके द्वारा अर्जित की गई अकूट संपत्ति को लेकर लोगों द्वारा सवाल उठाए जा रहे हैं। और उठाए भी क्यूँ नहीं? तो ऐसे में एक नाम सामने आता है। प्रो. आलोक सागर। जिनका जन्म संभ्रांत परिवार में हुआ। उच्च शिक्षा हासिल की। प्रतिभा ऐसी कि शोध के लिए अमेरिका बुलाया गया। लौटो से IIT दिल्ली ने बतौर प्राफेसर नियुक्त किया, लेकिन समाज के लिए आदिवासी बन गए।परिवार भी संपन्न और उच्चशिक्षित है, जिंदगी में कोई तनाव भी नहीं था, सफलता कदम चूम रही थी परंतु पूरी जिंदगी आदिवासियों के नाम कर दी। पैरों में टायर की बनी चप्पलें, हाथ में झोला, उलझे हुए बाल, कोई कह ही नहीं सकता कि ये वही व्यक्ति है जिसे अंग्रेजी सहित कई विदेशी भाषाएं आतीं ।

प्रोफेसर आलोक सागर का जन्म 20 जनवरी 1950 को दिल्ली में हुआ। आईआईटी दिल्ली में इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग की। 1977 में अमेरिका के हृयूस्टन यूनिवर्सिटी टेक्सास से शोध डिग्री ली। टेक्सास यूनिवर्सिटी से डेंटल ब्रांच में पोस्ट डाक्टरेट और समाजशास्त्र विभाग, डलहौजी यूनिवर्सिटी, कनाडा में फैलोशिप भी की। पढ़ाई पूरी करने के बाद आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर बन गए। यहां मन नहीं लगा तो नौकरी छोड़ दी। इस बीच वे यूपी, मप्र, महाराष्ट्र में रहे।

भाई-बहनों के पास भी है अच्छी डिग्रियां
आलोक सागर के पिता सीमा व उत्पाद शुल्क विभाग में कार्यरत थे। एक छोटा भाई अंबुज सागर आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर है। एक बहन अमेरिका कनाडा में तो एक बहन जेएनयू में कार्यरत थी। माता भी दिल्ली विश्वविद्यालय मे प्रोफेसर हैं।सागर बहुभाषी है और कई विदेशी भाषाओं के साथ ही वे आदिवासियों से उन्हीं की भाषा में बात करते हैं। आलोक सागर 25 सालों से आदिवासियों के बीच रह रहे हैं। उनका पहनावा भी आदिवासियों की तरह ही है।

पता कैसे चला
उनके बारे में किसी को जानकारी भी नहीं होती अगर बीते दिनों घोड़ाडोंगरी उपचुनाव में उनके खिलाफ कुछ लोगों द्वारा बाहरी व्यक्ति के तौर पर शिकायत नहीं की गई होती। पुलिस से शिकायत के बाद जांच पड़ताल के लिए उन्हें थाने बुलाया गया था। तब पता चला कि यह व्यक्ति कोई सामान्य आदिवासी नहीं बल्कि एक पूर्व प्रोफेसर हैं।

अब तक लगा चुके हैं 50 पौधे
आलोक सागर ने 1990 से अपनी तमाम डिग्रियां संदूक में बंदकर रख दी थीं। बैतूल जिले में वे पिछले 26 साल से आदिवासियों के साथ सादगी भरा जीवन बीता रहे हैं। वे आदिवासियों के सामाजिक, आर्थिक और अधिकारों की लड़ाई लड़ते हैं। इसके अलावा गांव में फलदार पौधे लगाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक अब तक 50 हजार फलदार पौधे लगाकर आदिवासियों में गरीबी से लड़ने की उम्मीद जगा रहे हैं। उन्होंने ग्रामीणों के साथ मिलकर चीकू, लीची, अंजीर, नीबू, चकोतरा, मौसंबी, किन्नू, संतरा, रीठा, मुनगा, आम, महुआ, आचार, जामुन, काजू, कटहल, सीताफल के सैकड़ों पेड़ लगाए हैं।

बच्चों की पढ़ाई में करते हैं मदद
आलोक आज भी साइकिल से पूरे गांव में घूमते हैं। आदिवासी बच्चों को पढ़ाना और पौधों की देखरेख करना उनकी दिनचर्या में शामिल है। कोचमहू आने के पहले वे उत्तरप्रदेश के बांदा, जमशेदपुर, सिंह भूमि, होशंगाबाद के रसूलिया, केसला में भी रहे हैं। इसके बाद 1990 से वे कोचमहू गांव में आए और यहीं बस गए।

शनिवार, 6 मई 2017

चंपारण सत्याग्रह के बहाने राजनीति




आज से ठीक सौ साल पहले चंपारण सत्याग्रह की ऐतिहासिक घटना घटी थी। उस वक्त और आज के वक्त को अगर देखा जाए तो पूरी परिदृश्य बदला हुआ नजर आता है। लेकिन समानता दिखती है तो केवल एक बात को लेकर दिखती है वो है किसानों की बदहाली को लेकर। उस वक्त भी किसान बदहाल थे। भगवान भरोसे उनकी जिंदगी थी। ब्रिटिश हुकूमत के पास किसानों को देने के लिए उस वक्त कठोर नियम-कानून के अलावे कुछ नहीं था। ठीक सौ साल बाद आज भी कमोवेश किसानों के साथ वो तमाम घटनाएं घटित हो रही है जो उस वक्त हुआ करती थी। आज भी सरकार द्वारा किसानों को केवल आश्वासन की घुट्टी पिलाई जाती है। इसके अलावे और कुछ नहीं। फर्क अब और तब में बस इतना रह गया है कि उस वक्त हर गलती के लिए गैर लोग जिम्मेवार थे और अब अपने लोग ही गैरों जैसे वर्ताव कर रहे हैं।
 खैर ये बातें तो चलती रहेगी। असल मुद्दा तो चंपारण सत्याग्रह के राजनीति को लेकर थी। दरअसल बिहार सरकार द्वारा चंपारण सत्याग्रह के शताब्दी के उपलक्ष्य में देश भर के स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मानित करने का फैसला किया गया। सरकार का यह निर्णय अगर सीधे तौर पर देखे तो सही नजर आता है। क्योंकि आजादी के सात दशक बाद भी आजादी के इन दिवानों को एक साथ कभी नहीं सम्मानित किया गया था। लेकिन बात यहीं नहीं रुकी। सरकार ने गांधी के विचारों को गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए रथ यात्रा का प्रारंभ किया। इसके अलावे चंपारण सत्याग्रह को लेकर सालों भर उत्सव मनाने की घोषणा की। अब जरा कल्पना कीजिए जिस राज्य की शिक्षा व्यवस्था राष्ट्रीय मानक की तुलना में दस फीसद कम हो। भूखमरी, बेरोजगारी सहित तमाम तरह की बुराईयों का दंश जहां की जनता झेल रही हो वहां कि सरकार लोगों के समाजिक और आर्थिक स्थिति का प्रवाह न कर उत्सव मनाने में लगी है। बिहार के मुख्यमंत्री को ये बात क्यों नहीं समझ आती कि जिस गांधी को आज देश के लोग महात्मा के नाम से जानते हैं। उसे महात्मा बनाने वाला और कोई नहीं बल्कि बिहार के किसान हैं। चंपारण सत्याग्रह के सफल प्रयोग के बाद ही गांधी जी महात्मा की नजरों से देसभर में पूजे जाने लगे। क्योंकि उस समय सरकार द्वारा किसानों के उपर जिस तरह से अत्याचार किए जा रहे थे, उससे किसान वर्गों में खासी निराशा थी।
  अच्छा तो ये होता की बिहार सरकार चंपारण आंदोलन के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य पर किसानों के हितों की रक्षा के लिए कोई विशेष रूप रेखा तैयार करती। जिससे किसानों की जिंदगी में हरियाली आ सके। लेकिन सरकार को अपनी राजनीति रोटी जो सेकनी थी। चंपारण सत्याग्रह के माध्यम से। 

शुक्रवार, 5 मई 2017

रेशमी शहर को विकास की दरकार

भागलपुर को कर्मयोगी मेयर की तलाश है । जो सच में भोलानाथ पुल के नीचे जलजमाव की समस्या से निजात दिलाए। गिरधारी साव लेन के फुटपाथी दुकानदारों के दर्द को समझे, जिन्हें घुटने भर कीचड़ में खड़ा रहना पड़ता है । जो हथिया नाला को दुरूस्त कराए। ताकि फिर कभी बारिश के मौसम में कोई छात्र हथिया नाला में न बह जाए । इस तरह की हजारों समस्याएँ जिससे रोज हर भागलपुरवासी को परेशानी उठानी पडती है, से निजात दिला सके।
#भागलपुर नगर निगम

निकाय चुनाव में सरकारी तंत्र का उपयोग

पटना में मैं जिस जगह रहता हूँ, ठीक उसके बगल में वर्तमान पार्षद का घर है ।मेहरारु दस वर्ष से पार्षद थी सो वे पार्षद पति की कुर्सी पर दस वर्ष से काबिज हैं । इस बार आरक्षण की बंदिशें समाप्त होने की वजह से खुद चुनावी मैदान में हैं । आज उन्हें कलेक्ट्रेट आॅफिस में पर्चा दाखिल करना था, सुबह से ही उनके दरवाजे पर चहल-पहल थी । लेकिन आखिरी वक्त तक माननीय के अपेक्षाओं के अनुरूप 'नारेबाजों' की संख्या काफी कम थी। अंत में माननीय ने उस वार्ड के सारे सफाई कर्मचारी को जुलूस में शामिल कर लिया । लेकिन फिर भी माननीय के चेहरे पर निराशा के बादल छाए हुए थे। कमोबेश पटना नगर निगम के अधिकांश वर्तमान पार्षदों का यही हाल है । सरकारी तंत्र का अपने सुविधा के अनुसार उपयोग करना ।
# Patna # पटना नगर निगम

पटना के माननीय मेयर

पटना के मेयर ने अपनी महत्वाकांक्षा के लिए शहर को गर्त तक पहुंचने में कोई कसर नहीं छोड़ा। परिणाम सामने हैं । राष्ट्रीय स्तर पर स्वच्छता के मामले में शहर का स्थान ढाई सौ के पार है । जनाब खुद को इतने अधिक काबिल समझते थे की इन्हें किसी नगर आयुक्त से पटता ही नहीं था और इसका खामियाजा पटनावासी को भुगतना पड़ रहा है । स्मार्ट सिटी तो दूर अब तो ये भी डर लगने लगा है की स्वच्छता को लेकर कहीं पटना नीचे से टाॅप न कर जाए।
# पटना नगर निगम # पटना मेयर

बुधवार, 18 जनवरी 2017

इलेक्ट्रॉनिक नगरी (बंगलुरू)

मित्रों आज मैं एक घने जंगल से चार दिनों की घुटन व मशक्कत के बाद निकलने वाला हूँ । ये एक ऐसा जंगल है जहाँ पेड़ नहीं है बल्कि कंकृटों से निर्मित ये घना जंगल है ।रोशनी से जगमगाती इस जंगल में जानवर की जगह इंसानों का वास है । भीड़ भरी राहों में भी लोग खुद को अकेला पाता है । विकास की चाह ने यहां के इंसानों को मशीन में परिवर्तित कर दिया है । शायद इसी लिए यहां के इंसानों के अंदर से इंसानियत पूरी तरह समाप्त हो गई है। क्या हमें यही विकास चाहिए जो हमें अपनी जड़ों से दूर कर दे?