मंगलवार, 28 जुलाई 2020

सिल्क सिटी की राहों ने फिर सुना सन्नाटा

 सिल्क सिटी की राहों ने एक बार फिर सन्नाटे को सुना। गुरुवार को लॉकडाउन पूरी तरह प्रभावी दिखा। दोपहर में शहर की सड़कें सूनी थीं। दुकानें बंद थींं। इक्का-दुक्का लोग नजर आ रहे थे। कुछ बिक रहा था तो मास्क और सैनिटाइजर। सड़क किनारे सब्जी की दुकानें आम दिनों की तरह सजी थीं, लेकिन खरीदार नहीं पहुंच रहे थे। कल तक जो टमाटर 80 रुपये प्रति किलो में इठला रहा था, आज उसकी कीमत गिर कर 60 हो गई थी। हालांकि, गली-मुहल्लों में राशन आदि की दुकानों के शटर आधे खुले थे। ग्राहकों के अनुरोध पर दुकानदार सामान दे रहे थे। ऐसा नहीं था कि इस सबके लिए पुलिस-प्रशासन को खूब मशक्कत करनी पड़ी हो। यह सब स्वत: स्फूर्त दिख रहा था। मानों लोगों ने समझ लिया हो कि घर में रहकर ही खुद को सुरक्षित और कोरोना को हराया जा सकता है। 
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बरारी रोड, समय : 02:00 बजे
रोड पर चहल-पहल न के बराबर है। हां, कुछ एक बाइक सवार थोड़े अंतराल पर आते-जाते जरूर दिख रहे हैं। हाउसिंग बोर्ड चौराहे पर भी लगभग दुकानें बंद हैं। माउंट कार्मेल के सामने एक औरत टोकरी में आम लिए बैठी है, लेकिन वहां कोई भी खरीदार नहीं है। सरकारी बस डीपो के अंदर विरानी छाई है। बस एक टेंपो खड़ा है। 
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तिलकामांझी चौक, समय : 02:05 बजे 
यहां कुछ बिहार पुलिस और रैफ के जवान दिख रहे हैं। तेज धूप होने के कारण सभी पेड़ के नीचे खड़े हैं। यहां स्टेशन की ओर से एक ई-रिक्शा आता दिख रहा है, लेकिन उसपर केवल एक सवारी बैठा है। बेरोक-टोक चौराहे से होते हुए ई-रिक्शा जीरोमाइल की ओर बढ़ जाता है। मेडिकल कॉलेज रोड में थोड़ी दूर आगे बढऩे पर कुछ सब्जी की दुकानें सजी हैं, लेकिन ग्राहक नहीं पहुंच रहे हैं। 

रानी लक्ष्मीबाई चौक 02:10 बजे  
आम दिन तो यहां हमेशा पुलिस के जवान तैनात रहते दिखते हैं, लेकिन आज यहां एक भी जवान नहीं हैं। चौक से कुछ दूर साइकिल पर मास्क की दुकान सजाए एक-दो युवक दिख रहे हैं। लोगों की चहल-पहल यहां न के बराबर है। 

आदमपुर चौक, समय : 02:15 बजे 
यहां पर कुछ लोग आते-जाते दिख रहे हैं। साथ ही चौक के पास सब्जी मंडी में कुछ दुकानदार ग्राहकों का इंतजार करते दिख रहे हैं। हालांकि, गिनती के एक-दो खरीदार ही यहां दिख रहे हैं। यहां पुलिस के जवान नहीं दिख रहे हैं। 

बूढ़ानाथ मंदिर रोड, समय : 02:25 बजे 
बूढ़ानाथ मंदिर की ओर जाने वाली सड़क सूनी दिखी। साथ ही चौक पर सन्नाटा पसरा हुआ है। हालांकि, गली में कुछ दुकानें खुली हैं। दुकानदारों ने आधे शटर को खोल कर रखा है। ग्राहकों के आने पर वे शटर को पूरा खोलते हैं और सामन देने के बाद शटर को फिर से नीचे सरका देते हैं। यहां मोहल्ले के एक-दो युवक घर के बाहर टहलते दिख रहे हैं। 

गोलाघाट रोड, समय : 02:30 बजे 
यहां लॉकडाउन का असर सबसे अधिक दिख रहा है। सड़क पर सन्नाटा पसरा है। दुकानों के शटर भी बंद हैं। थोड़े अंतराल पर यहां से एक दो गाडिय़ां गुजरीं, जिसने सन्नाटे में खलल डाला। 

सराय चौक, समय : 02:45 बजे 
चौराहे पर दो रिक्शा चालक सवारियों का इंतजार करते दिख रहे हैं। लोगों की आवाजाही न के बराबर है। महादेव सिंह कॉलेज की ओर जाने वाली सड़क पर पूरा सन्नाटा पसरा हुआ है। हां, एक दो मोबाइल की दुकानें खुली हैं, पर खरीदार यहां भी नहीं दिख रहे हैं। 


विवि गेट, समय : 03:00 बजे 
सालों भर विद्यार्थियों से गुलजार रहने वाला यह इलाका वीरान है। विवि गेट के सामने की सभी चाय और नाश्ते की दुकानें बंद हैं। आगे बढऩे पर विवि स्टेडियम के पास के चौराहे पर कुछ जवान तैनात हैं। पर, यहां भी कोई आदमी नहीं दिख रहा। यहीं स्थिति मारवाड़ी कॉलेज के सामने भी है। 


टीएनबी कॉलेज गेट 03:10 बजे 
विवि थाने का गश्ती दल यहां पुलिस गाड़ी लगा कर खड़ी है। नाथनगर की ओर से स्टेशन की ओर कुछ बाइक सवार आते-जाते दिख रहे हैं। आगे बढऩे पर परबत्ती चौक के पास कुछ लोग रोड किनारे खड़े होकर बातचीत करते दिख रहे हैं। यहां कुछ चाय-पान की दुकानें खुलीं हैं। 


तातारपुर चौक, समय : 03:15 बजे
लॉकडाउन का असर यहां पर कम दिख रहा है। अन्य चौक-चौराहे की तुलना में यहां लोगों का चहल-पहल ज्यादा है। चौक के पास पुलिस की गाड़ी लगी है। सभी जवान गाड़ी में बैठे हैं। यहां एक दो राशन की और कुछ चाय की दुकानें खुली हैं। 

स्टेशन चौक, समय : 03:30 बजे
यहां तातारपुर की तरफ स्टेशन गेट के सामने करीब दस रिक्शा चालक खड़े हैं, लेकिन लोग यहां नहीं दिख रहे हैं। गेट के सामने चाय-पान की तीन दुकानें खुली हैं। दुकान के सामने एक-दो लोग चाय पीते दिख रहे हैं। आगे बढऩे पर एक फल की दुकान खुली है। ग्राहक नहीं हैं। लोहिया पुल के नीचे लोग सब्जी और राशन खरीदते दिख रहे हैं। 


कोयला डिपो बस स्टैंड, समय : 03:35 बजे 
यहां रोड किनारे करीब आधा दर्जन सब्जी की दुकान लगी है। पास ही कुछ रिक्शा चालक भी सवारी का इंतजार करते दिख रहे हैं। चौक पर ही दो-तीन बीज भंडार भी खुले हैं। बस स्टैंड में कुछ गाडिय़ां खड़ी हैं, लेकिन न तो वहां एक भी ड्राइवर दिख रहे हैं और न ही कोई और। 

त्रिमूर्ति चौक, समय : 03:40 बजे
स्टेशन की तरफ से आगे बढऩे पर चौक से पहले एक निजी क्लिनिक के बार दो एंबुलेंस खड़ी है। एंबुलेंस को कुछ लोग घेरे खड़े हैं। पास पहुंचने पर पता चला कि सड़क दुर्घटना में घायल एक गंभीर मरीज को लाया गया है। क्लिनिक के पास की मेडिकल दुकानें खुली हैं। चौके से आगे बढऩे पर मीट की अधिकांश दुकानें खुली दिख रही हैं। पर, खरीदार यहां भी नहीं दिख रहे हैं। 

भागलपुरिया जर्दालू और कतरनी की प्रोसेसिंग अब मुबई में जर्दालू आम और कतरनी चूड़ा सिल्क सिटी भागलपुर की पहचान रही है। हाल के वर्षों में इसकी ख्याति क्षेत्र और राज्य की सीमाओं को लांघकर कर विदेशों तक जा पहुंची है। भागलपुर के इन उत्पादों को और व्यापक फलक पर ले जाने की कवायद शुरू हो गई है, लेकिन इस वर्ष कोरोना ने इसकी गति पर ब्रेक लगा दिया। सुल्तानगंज के किसान मुंबई में इसकी प्रोसेसिंग पर काम कर रहे हैं। इसके लिए अजगैवीनाथ किसान उत्पाद संगठन बनाया है। इस संगठन ने मुंबई की एक कंपनी के साथ करार भी किया गया है। जर्दालू के पल्प से जूस और अन्य उत्पाद तैयार किए जाने हैं। कोरोना के कारण इस बार आम की आपूर्ति बहुत कम हो सकी। अब ये लोग कतरनी की प्रोसेसिंग के लिए काम कर रहे हैं। कतरनी धान से पोहा और अन्य उत्पाद तैयार कर देश और देश के बाहर इसका निर्यात किया जाएगा। समूह में करीब 150 किसान जुड़े हैं। सभी कतरनी और जर्दालू के उत्पादक हैं। इसमें कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंध अभिकरण (आत्मा) भागलपुर का बराबर सहयोग मिल रहा है। रुकेगा पलायन, सामूहिक खेती को मिलेगा बढ़ावा समूह से जुड़े किसान अनुरंजन सिंह, राहुल देव, उपेंद्र सिंह, अनिल कुमार ने बताया कि मुंबई में कतरनी और जर्दालू की प्रोसेसिंग होने से किसानों को उत्पाद का उचित मूल्य मिल सकेगा। किसानों के पलायन पर रोक लगेगी। किसानों ने बताया कि अभी छोटे स्तर पर कतरनी की खेती कर रहे हैं, उचित कीमत मिलने से इसे व्यापक पैमाने पर किया जाएगा। इससे सामूहिक खेती को भी बढ़ावा मिलेगा। समूह के किसान साथ-साथ मिलकर समृद्धि की कहानी लिखेंगे। कुंदन के प्रयास से संगठित हुए किसान जर्दालू और कतरनी की प्रोसेसिंग शुरू कराने के लिए भागलपुर के सुल्तानगंज निवासी कुंदन पिछले डेढ़ साल से काम कर रहे हैं। रांची के बिरला टेक्निकल संस्थान से बीटेक और बेल्जियम से एमबीए करने वाले कुंदन ने कतरनी और जर्दालू पर काफी शोध किया है। उन्होंने बताया कि कोरोना महामारी के कारण अभी छोटे स्तर पर इसकी शुरुआत की गई है। जल्द ही दोनों उत्पादों को समूह विदेश भी भेजेगा। जर्दालू और कतरनी उत्पादक किसानों ने अजगैवीनाथ किसान समूह का गठन किया है। आत्मा की ओर से इन किसानों को हर संभव मदद उपलब्ध कराई जा रही है। प्रभात कुमार सिंह, उप परियोजना निदेशक, आत्मा, भागलपुर

सोमवार, 13 मई 2019

तेजप्रताप के गुस्से की वजह

लोकसभा चुनाव समाप्त होने के कगार पर है। इस दौरान बिहार की राजनीति में एक युवा नेता ने खूब सुर्खियां बटोरी। कभी विवादित बयान तो कभी विद्रोही तेवरों को लेकर लोगों की जुबा पर रहे। जी हाँ, आपने ठीक समझा। मैं बात कर रहा हूँ राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव की। यूं तो लालू परिवार में विवादों का बीजारोपण उसी वक्त हो गया था जब 2015 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार बन रही थी। उस वक्त लालू ने बड़े बेटे तेजप्रताप की जगह छोटे बेटे तेजस्वी को उपमुख्यमंत्री पद सौंपा और तेजप्रताप को मंत्री पद। यही से गैर बराबरी और पारिवारिक विवाद शुरू हुआ। लोकसभा चुनाव के दौरान यह विवाद चरम पर पहुँच गया।
इसके कई कारणों में से एक ऐश्वर्या से विवाह और फिर तेजप्रताप द्वारा तलाक की अर्जी। लालू परिवार इस संबंध को बनाये रखना चाहता है। इसलिए परिवार के किसी भी सदस्य ने तेजप्रताप के इस निर्णय का समर्थन नहीं किया।
पार्टी में तेजप्रताप की जगह तेजस्वी को ज्यादा महत्व दिया जाना।
सारण की सीट से ससुर चंद्रिका राय को टिकट दिया जाना।
जहानाबाद से चंद्रशेखर की जगह सुरेंद्र को टिकट ।

शनिवार, 6 जनवरी 2018

 मध्यमवर्गी बिहारी छात्रों की पहली पसंद रेलवे

 देश के विभिन्न रेलवे स्टेशनों पर भारी संख्या में नियुक्त बिहारी युवाओं को देखकर अन्य पदेशों में इसको लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही है। इसके अलावे रेलवे की बहाली में भारी संख्याओं में बिहारियों द्वारा दबदबा बनाए रखना कोई नई बात नहीं है। आइए जाने क्यों और कब से रेलवे बिहारियों के बन गया पसंदीदा।


  1. आज देश के अंदर विरले ही कोई रेलवे स्टेशन हो जहां कि बिहारी नौकरी ना कर रहा हो।  कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि आज देश के लगभग हर स्टेशन पर आपको कोई न कोई बिहारी युवक नौकरी करते मिल जाएंगे। बिहारी आपको विभिन्न पदों पर मिल जाएंगे। चाहे वह टीकट चेकिंग का काम करता हो। प्लेटफाॅर्म पर झाडू लगाने का काम करता हो। ट्रेन चलाने का काम करता हो या फिर पटरियों पर नट कसने का काम हो। यानी कि गैंग मैन या ट्रैक मैन का काम करता हो। आपको हर स्तर पर बिहारी छात्र नौकरी करते मिल जाएंगे।  रेले के हर स्तर पर आपको बड़ी संख्या में बिहारी नौकरते करते मिल जाएंगे हाल के दिनों में इसको लेकर देश के अन्य राज्यों में एक बहस छिड़ा हुआ है कि आखिर इतनी संख्या में बिहारी छात्र रेलवे की प्रतियोगिता परीक्षा को कैसे पास कर लेते हैं। आइए आज इन रहस्यों से पर्दा उठाने का प्रयास किया जाए।

उदारीकरण के दौर से ही बिहारी छात्रों के सामने रोजगार संकट 
रेलवे के प्रति बिहारी छात्रों का झुकाव कोई नई बात नहीं है। दशकों से इस क्षेत्र में बिहारी छात्रों का झुकाव रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में इस क्षेत्र के प्रति और ज्याद झुकाव हो गया है। इस झुकाव को समझने के लिए आपको बिहारी पृष्ठभूमि को समझना अति आवश्यक है। नब्बे के दशके के बाद या यूं कहें तो उससे भी पहले से हीं बिहार की अर्थव्यवस्था लगातार डाउन टू अर्थ की ओर जाने लगा। इसके कई वजह रहे होंगे लेकिन प्रमुख रुप से कहें तो राजनीतिक उठा-पटक महत्वपूर्ण है। इस कारण इक्कीसवीं शदी आते-आते बिहार पूरी तरह से बिमारू राज्य में शामिल हो गया उद्योग का विकास नहीं हो सका रोजी-रोजगार के लिए यहां के लोगों के पास खेती के अलावे और कोई विकल्प नहीं रह गया था। इसके अलावे इस समय तक राज्य में शिक्षा-व्यवस्था भी लगभग ध्वस्त हो चुका था। इन सब का मार कहीं न कहीं प्रत्यक्ष रूप से बिहारी छात्रों को झेलनी पड़ी।


आर्थिक तंगी के कारण अच्छी शिक्षा से बिहारी छात्र बंचित
उद्योग-धंधे का विकास नहीं होने से लोगों के पास इतने पैसे नहीं थे की वे अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ा सकें। उनके पास सरकारी स्कूल ही एक मात्र विकल्प के रूप में बचा था। लेकिन उस समय तक सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर काफी गिर चुका था। इसके अलावे यह वह समय था जब देश में अंग्रेजी का बर्चस्व बढ़ने लगा था। लेकिन बिहार के स्कूलों में न तो उस समय के सरकार ने और न ही आज के सरकार ने अंग्रेजी को पूरी तरह से अनिवार्य करना उचित समझा नतीजा बिहार के छात्र जैसे तैसे पढ़कर मैट्रिक से लेकर एमए तक पास तो कर गए। मगर वे उन विदेशी कंपनियों के लिए अनुकूल न बन सके क्योंकि उन्हें फर्राटे तार अंग्रेजी बोलने वाला कर्मचारी चाहिए था। लेकिन बिहारी छात्रों में तमाम गुण होने के बाद भी वे बेरोजारी का दंश झेलने को विवश होने लगे।

रविवार, 17 दिसंबर 2017

मोदी राज में बिहार के होनहार हो रहे हैं बेरोजगार  


यूं तो बिहार में रोजार को लेकर वर्षों से मारा-मारी है। प्लायन के सबसे ज्यादा मामले बिहार में ही देखने को मिलाता है। रोजी-रोजगार के लिए लोग अपनों को छोड़कर कोसों दूर रहने को विवस हैं। इन सब के बावजूद भी बिहार में प्रतिभा की कमी नहीं है। सरकारी नौकरियों में सबसे ज्यादा बिहारी युवा ही मिलेगें। लेकिन हाल के वर्षों में खास कर केंद्र में एनडीए की सरकार बनने के बाद से एक तरह से बिहारी युवा संक्रमण काल में जी रहे हैं। इसका मुख्य कारण है रेलवे सहित अन्य केंद्रीय मंत्रालियों में बहाली में रोक लगाया जाना।
बिहार के एक परीक्षाा केंद्र के बाहर छात्र (फाइल फोटो)
हिंदी के प्रति बिहारी का प्यार 
यूं तो कहने को भारत, गांवों का देश है। लेकिन बिहार के साथ यह कथन पूरी तरह से  फीट बैठता है। बिहार में आज भी लगभग अस्सी फीसदी से अधिक लोग किसी न किसी रूप में गांव से जुड़े हुए हैं। एक तो बिहार हिंदी भाषी प्रदेश है साथ ही साथ ग्रामीण पृष्ठभूमि होने के कारण यहां के छात्रों को अंग्रेजी की पढ़ाई में रूची नहीं लगती है। इसलिए यहां के अधिकांश छात्रों का हिंदी के प्रति रूची काफी अधिक है। यहीं कारण है कि बिहार में रेलवे भर्ती की तैयारी करने वाले छात्रों की संख्या काफी अधिक है।

भारतीय रेलवे (फाइल फोटो)

रेलवे के ग्रुप डी पद पर चार लाख होनी थी नियुक्तियां 
2012 में राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक आयोजित की गई थी। उस समय यूपीए का शासनकाल था। उस बैठक में रेलवे में कर्मचारियों की कमी के मद्देनजर तय किया गया था कि अगले पांच साल तक रेलवे में कर्मियों की कमी को दूर कर लिया जाएगा। इसके तहत ग्रुप डी के 4 लाख कर्मियों की बहाली होनी थी यानी की हर साल 80 हजार कर्मियों की बहाली की जानी थी। और ऐसा हुआ भी। वर्ष 2013 और 2014 में अस्सी-अस्सी हजार निकाला गया।
एनडीए सरकार के आने के बाद रूका बहाली 
वर्ष 2014 में आम चुनाव के बाद जैसे ही केंद्र की सत्ता पर एनडीएआई आई, इसने सबसे पहले रेलवे के इस बहाली को पूरी तरह रोक दिया। यानी की दो लाख चालीस हजार पदों की बहाली पर रोक लगा दी गई। ये रोक अब तक जारी है। यानी की तीन साल बाद भी रेलवे में फिर बहाली नहीं निकाली गई।

शनिवार, 30 सितंबर 2017

ये हैं IIT के प्रोफेसर आलोक सागर: 21वीं सदी महान संत

आज जब देश भर में बाबाओं के चरित्र, रहन-सहन, खान-पान एवं उनके द्वारा अर्जित की गई अकूट संपत्ति को लेकर लोगों द्वारा सवाल उठाए जा रहे हैं। और उठाए भी क्यूँ नहीं? तो ऐसे में एक नाम सामने आता है। प्रो. आलोक सागर। जिनका जन्म संभ्रांत परिवार में हुआ। उच्च शिक्षा हासिल की। प्रतिभा ऐसी कि शोध के लिए अमेरिका बुलाया गया। लौटो से IIT दिल्ली ने बतौर प्राफेसर नियुक्त किया, लेकिन समाज के लिए आदिवासी बन गए।परिवार भी संपन्न और उच्चशिक्षित है, जिंदगी में कोई तनाव भी नहीं था, सफलता कदम चूम रही थी परंतु पूरी जिंदगी आदिवासियों के नाम कर दी। पैरों में टायर की बनी चप्पलें, हाथ में झोला, उलझे हुए बाल, कोई कह ही नहीं सकता कि ये वही व्यक्ति है जिसे अंग्रेजी सहित कई विदेशी भाषाएं आतीं ।

प्रोफेसर आलोक सागर का जन्म 20 जनवरी 1950 को दिल्ली में हुआ। आईआईटी दिल्ली में इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग की। 1977 में अमेरिका के हृयूस्टन यूनिवर्सिटी टेक्सास से शोध डिग्री ली। टेक्सास यूनिवर्सिटी से डेंटल ब्रांच में पोस्ट डाक्टरेट और समाजशास्त्र विभाग, डलहौजी यूनिवर्सिटी, कनाडा में फैलोशिप भी की। पढ़ाई पूरी करने के बाद आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर बन गए। यहां मन नहीं लगा तो नौकरी छोड़ दी। इस बीच वे यूपी, मप्र, महाराष्ट्र में रहे।

भाई-बहनों के पास भी है अच्छी डिग्रियां
आलोक सागर के पिता सीमा व उत्पाद शुल्क विभाग में कार्यरत थे। एक छोटा भाई अंबुज सागर आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर है। एक बहन अमेरिका कनाडा में तो एक बहन जेएनयू में कार्यरत थी। माता भी दिल्ली विश्वविद्यालय मे प्रोफेसर हैं।सागर बहुभाषी है और कई विदेशी भाषाओं के साथ ही वे आदिवासियों से उन्हीं की भाषा में बात करते हैं। आलोक सागर 25 सालों से आदिवासियों के बीच रह रहे हैं। उनका पहनावा भी आदिवासियों की तरह ही है।

पता कैसे चला
उनके बारे में किसी को जानकारी भी नहीं होती अगर बीते दिनों घोड़ाडोंगरी उपचुनाव में उनके खिलाफ कुछ लोगों द्वारा बाहरी व्यक्ति के तौर पर शिकायत नहीं की गई होती। पुलिस से शिकायत के बाद जांच पड़ताल के लिए उन्हें थाने बुलाया गया था। तब पता चला कि यह व्यक्ति कोई सामान्य आदिवासी नहीं बल्कि एक पूर्व प्रोफेसर हैं।

अब तक लगा चुके हैं 50 पौधे
आलोक सागर ने 1990 से अपनी तमाम डिग्रियां संदूक में बंदकर रख दी थीं। बैतूल जिले में वे पिछले 26 साल से आदिवासियों के साथ सादगी भरा जीवन बीता रहे हैं। वे आदिवासियों के सामाजिक, आर्थिक और अधिकारों की लड़ाई लड़ते हैं। इसके अलावा गांव में फलदार पौधे लगाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक अब तक 50 हजार फलदार पौधे लगाकर आदिवासियों में गरीबी से लड़ने की उम्मीद जगा रहे हैं। उन्होंने ग्रामीणों के साथ मिलकर चीकू, लीची, अंजीर, नीबू, चकोतरा, मौसंबी, किन्नू, संतरा, रीठा, मुनगा, आम, महुआ, आचार, जामुन, काजू, कटहल, सीताफल के सैकड़ों पेड़ लगाए हैं।

बच्चों की पढ़ाई में करते हैं मदद
आलोक आज भी साइकिल से पूरे गांव में घूमते हैं। आदिवासी बच्चों को पढ़ाना और पौधों की देखरेख करना उनकी दिनचर्या में शामिल है। कोचमहू आने के पहले वे उत्तरप्रदेश के बांदा, जमशेदपुर, सिंह भूमि, होशंगाबाद के रसूलिया, केसला में भी रहे हैं। इसके बाद 1990 से वे कोचमहू गांव में आए और यहीं बस गए।

शनिवार, 6 मई 2017

चंपारण सत्याग्रह के बहाने राजनीति




आज से ठीक सौ साल पहले चंपारण सत्याग्रह की ऐतिहासिक घटना घटी थी। उस वक्त और आज के वक्त को अगर देखा जाए तो पूरी परिदृश्य बदला हुआ नजर आता है। लेकिन समानता दिखती है तो केवल एक बात को लेकर दिखती है वो है किसानों की बदहाली को लेकर। उस वक्त भी किसान बदहाल थे। भगवान भरोसे उनकी जिंदगी थी। ब्रिटिश हुकूमत के पास किसानों को देने के लिए उस वक्त कठोर नियम-कानून के अलावे कुछ नहीं था। ठीक सौ साल बाद आज भी कमोवेश किसानों के साथ वो तमाम घटनाएं घटित हो रही है जो उस वक्त हुआ करती थी। आज भी सरकार द्वारा किसानों को केवल आश्वासन की घुट्टी पिलाई जाती है। इसके अलावे और कुछ नहीं। फर्क अब और तब में बस इतना रह गया है कि उस वक्त हर गलती के लिए गैर लोग जिम्मेवार थे और अब अपने लोग ही गैरों जैसे वर्ताव कर रहे हैं।
 खैर ये बातें तो चलती रहेगी। असल मुद्दा तो चंपारण सत्याग्रह के राजनीति को लेकर थी। दरअसल बिहार सरकार द्वारा चंपारण सत्याग्रह के शताब्दी के उपलक्ष्य में देश भर के स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मानित करने का फैसला किया गया। सरकार का यह निर्णय अगर सीधे तौर पर देखे तो सही नजर आता है। क्योंकि आजादी के सात दशक बाद भी आजादी के इन दिवानों को एक साथ कभी नहीं सम्मानित किया गया था। लेकिन बात यहीं नहीं रुकी। सरकार ने गांधी के विचारों को गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए रथ यात्रा का प्रारंभ किया। इसके अलावे चंपारण सत्याग्रह को लेकर सालों भर उत्सव मनाने की घोषणा की। अब जरा कल्पना कीजिए जिस राज्य की शिक्षा व्यवस्था राष्ट्रीय मानक की तुलना में दस फीसद कम हो। भूखमरी, बेरोजगारी सहित तमाम तरह की बुराईयों का दंश जहां की जनता झेल रही हो वहां कि सरकार लोगों के समाजिक और आर्थिक स्थिति का प्रवाह न कर उत्सव मनाने में लगी है। बिहार के मुख्यमंत्री को ये बात क्यों नहीं समझ आती कि जिस गांधी को आज देश के लोग महात्मा के नाम से जानते हैं। उसे महात्मा बनाने वाला और कोई नहीं बल्कि बिहार के किसान हैं। चंपारण सत्याग्रह के सफल प्रयोग के बाद ही गांधी जी महात्मा की नजरों से देसभर में पूजे जाने लगे। क्योंकि उस समय सरकार द्वारा किसानों के उपर जिस तरह से अत्याचार किए जा रहे थे, उससे किसान वर्गों में खासी निराशा थी।
  अच्छा तो ये होता की बिहार सरकार चंपारण आंदोलन के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य पर किसानों के हितों की रक्षा के लिए कोई विशेष रूप रेखा तैयार करती। जिससे किसानों की जिंदगी में हरियाली आ सके। लेकिन सरकार को अपनी राजनीति रोटी जो सेकनी थी। चंपारण सत्याग्रह के माध्यम से।