शनिवार, 6 मई 2017

चंपारण सत्याग्रह के बहाने राजनीति




आज से ठीक सौ साल पहले चंपारण सत्याग्रह की ऐतिहासिक घटना घटी थी। उस वक्त और आज के वक्त को अगर देखा जाए तो पूरी परिदृश्य बदला हुआ नजर आता है। लेकिन समानता दिखती है तो केवल एक बात को लेकर दिखती है वो है किसानों की बदहाली को लेकर। उस वक्त भी किसान बदहाल थे। भगवान भरोसे उनकी जिंदगी थी। ब्रिटिश हुकूमत के पास किसानों को देने के लिए उस वक्त कठोर नियम-कानून के अलावे कुछ नहीं था। ठीक सौ साल बाद आज भी कमोवेश किसानों के साथ वो तमाम घटनाएं घटित हो रही है जो उस वक्त हुआ करती थी। आज भी सरकार द्वारा किसानों को केवल आश्वासन की घुट्टी पिलाई जाती है। इसके अलावे और कुछ नहीं। फर्क अब और तब में बस इतना रह गया है कि उस वक्त हर गलती के लिए गैर लोग जिम्मेवार थे और अब अपने लोग ही गैरों जैसे वर्ताव कर रहे हैं।
 खैर ये बातें तो चलती रहेगी। असल मुद्दा तो चंपारण सत्याग्रह के राजनीति को लेकर थी। दरअसल बिहार सरकार द्वारा चंपारण सत्याग्रह के शताब्दी के उपलक्ष्य में देश भर के स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मानित करने का फैसला किया गया। सरकार का यह निर्णय अगर सीधे तौर पर देखे तो सही नजर आता है। क्योंकि आजादी के सात दशक बाद भी आजादी के इन दिवानों को एक साथ कभी नहीं सम्मानित किया गया था। लेकिन बात यहीं नहीं रुकी। सरकार ने गांधी के विचारों को गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए रथ यात्रा का प्रारंभ किया। इसके अलावे चंपारण सत्याग्रह को लेकर सालों भर उत्सव मनाने की घोषणा की। अब जरा कल्पना कीजिए जिस राज्य की शिक्षा व्यवस्था राष्ट्रीय मानक की तुलना में दस फीसद कम हो। भूखमरी, बेरोजगारी सहित तमाम तरह की बुराईयों का दंश जहां की जनता झेल रही हो वहां कि सरकार लोगों के समाजिक और आर्थिक स्थिति का प्रवाह न कर उत्सव मनाने में लगी है। बिहार के मुख्यमंत्री को ये बात क्यों नहीं समझ आती कि जिस गांधी को आज देश के लोग महात्मा के नाम से जानते हैं। उसे महात्मा बनाने वाला और कोई नहीं बल्कि बिहार के किसान हैं। चंपारण सत्याग्रह के सफल प्रयोग के बाद ही गांधी जी महात्मा की नजरों से देसभर में पूजे जाने लगे। क्योंकि उस समय सरकार द्वारा किसानों के उपर जिस तरह से अत्याचार किए जा रहे थे, उससे किसान वर्गों में खासी निराशा थी।
  अच्छा तो ये होता की बिहार सरकार चंपारण आंदोलन के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य पर किसानों के हितों की रक्षा के लिए कोई विशेष रूप रेखा तैयार करती। जिससे किसानों की जिंदगी में हरियाली आ सके। लेकिन सरकार को अपनी राजनीति रोटी जो सेकनी थी। चंपारण सत्याग्रह के माध्यम से। 

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