शनिवार, 6 जनवरी 2018

 मध्यमवर्गी बिहारी छात्रों की पहली पसंद रेलवे

 देश के विभिन्न रेलवे स्टेशनों पर भारी संख्या में नियुक्त बिहारी युवाओं को देखकर अन्य पदेशों में इसको लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही है। इसके अलावे रेलवे की बहाली में भारी संख्याओं में बिहारियों द्वारा दबदबा बनाए रखना कोई नई बात नहीं है। आइए जाने क्यों और कब से रेलवे बिहारियों के बन गया पसंदीदा।


  1. आज देश के अंदर विरले ही कोई रेलवे स्टेशन हो जहां कि बिहारी नौकरी ना कर रहा हो।  कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि आज देश के लगभग हर स्टेशन पर आपको कोई न कोई बिहारी युवक नौकरी करते मिल जाएंगे। बिहारी आपको विभिन्न पदों पर मिल जाएंगे। चाहे वह टीकट चेकिंग का काम करता हो। प्लेटफाॅर्म पर झाडू लगाने का काम करता हो। ट्रेन चलाने का काम करता हो या फिर पटरियों पर नट कसने का काम हो। यानी कि गैंग मैन या ट्रैक मैन का काम करता हो। आपको हर स्तर पर बिहारी छात्र नौकरी करते मिल जाएंगे।  रेले के हर स्तर पर आपको बड़ी संख्या में बिहारी नौकरते करते मिल जाएंगे हाल के दिनों में इसको लेकर देश के अन्य राज्यों में एक बहस छिड़ा हुआ है कि आखिर इतनी संख्या में बिहारी छात्र रेलवे की प्रतियोगिता परीक्षा को कैसे पास कर लेते हैं। आइए आज इन रहस्यों से पर्दा उठाने का प्रयास किया जाए।

उदारीकरण के दौर से ही बिहारी छात्रों के सामने रोजगार संकट 
रेलवे के प्रति बिहारी छात्रों का झुकाव कोई नई बात नहीं है। दशकों से इस क्षेत्र में बिहारी छात्रों का झुकाव रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में इस क्षेत्र के प्रति और ज्याद झुकाव हो गया है। इस झुकाव को समझने के लिए आपको बिहारी पृष्ठभूमि को समझना अति आवश्यक है। नब्बे के दशके के बाद या यूं कहें तो उससे भी पहले से हीं बिहार की अर्थव्यवस्था लगातार डाउन टू अर्थ की ओर जाने लगा। इसके कई वजह रहे होंगे लेकिन प्रमुख रुप से कहें तो राजनीतिक उठा-पटक महत्वपूर्ण है। इस कारण इक्कीसवीं शदी आते-आते बिहार पूरी तरह से बिमारू राज्य में शामिल हो गया उद्योग का विकास नहीं हो सका रोजी-रोजगार के लिए यहां के लोगों के पास खेती के अलावे और कोई विकल्प नहीं रह गया था। इसके अलावे इस समय तक राज्य में शिक्षा-व्यवस्था भी लगभग ध्वस्त हो चुका था। इन सब का मार कहीं न कहीं प्रत्यक्ष रूप से बिहारी छात्रों को झेलनी पड़ी।


आर्थिक तंगी के कारण अच्छी शिक्षा से बिहारी छात्र बंचित
उद्योग-धंधे का विकास नहीं होने से लोगों के पास इतने पैसे नहीं थे की वे अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ा सकें। उनके पास सरकारी स्कूल ही एक मात्र विकल्प के रूप में बचा था। लेकिन उस समय तक सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर काफी गिर चुका था। इसके अलावे यह वह समय था जब देश में अंग्रेजी का बर्चस्व बढ़ने लगा था। लेकिन बिहार के स्कूलों में न तो उस समय के सरकार ने और न ही आज के सरकार ने अंग्रेजी को पूरी तरह से अनिवार्य करना उचित समझा नतीजा बिहार के छात्र जैसे तैसे पढ़कर मैट्रिक से लेकर एमए तक पास तो कर गए। मगर वे उन विदेशी कंपनियों के लिए अनुकूल न बन सके क्योंकि उन्हें फर्राटे तार अंग्रेजी बोलने वाला कर्मचारी चाहिए था। लेकिन बिहारी छात्रों में तमाम गुण होने के बाद भी वे बेरोजारी का दंश झेलने को विवश होने लगे।

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