रविवार, 5 जून 2016

पत्रकार की हत्या पर व्यंग्य

🔸साहित्यिक और पत्रकार, लोकतंत्र के प्रहरी कहे जाते हैं ।
लेकिन बिहार में इनकी कोई औकात नहीं ।।
🔸दिन - दहाडे हो रही हत्या ।
फिर भी सरकार को कोई अफसोस नही ।।
🔸कहने को ये समाज के अग्रदूत ।
लेकिन खुद ही असुरक्षित है, महादूत।।
🔸कहने को ये चौथा स्तंभ ।
लोकतंत्र से कराती हमारी पहचान ।।
🔸ये कलम के सिपाही हैं ,
समाज को नित्य आईना दिखाते है।
इनके कारण जनता के आगे घुटनों के बल खड़ी सरकार ।
पुलिस - प्रशासन को भी लगती हरदम इनके कारण फटकार ।।
🔸लोग सुनाते इनको अपनी दुखडा।
इनकी दुखडा सुनता कौन ।।   🔶अभिषेक राव 🔶

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