रविवार, 15 मई 2016

वो परी

कविता - "वो चंचल, मधुरभाषी ना जाने आज क्यूँ उदास बैठी थी। ना जाने क्यूँ डलहन सी उसकी आॅखे भीगी -भीगी थी।खिलता हुआ चेहरा ना जाने क्यूँ गंभीर थी। घनघोर सन्नाटे को चिरने वाली उसकी चहकती हुईं जुबान क्यूँ खामोश थी।औरों के ऑशू को पोछने वाली, आज ना जाने क्यूँ खुद ऑशू बहा रही थी।हर वक्त चेहरे को निहारने वाली, ना जाने क्यूँ खुद से खिन्न थी। ना जाने आज वो किस बात को लेकर व्यथित थी।"

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