शुक्रवार, 20 मई 2016

माँ तेरा जो साथ था

कुछ पल का साथ था,        एक सुखद एहसास था ,       जब तक तेरा साथ था माँ ।। माँ, मेरे प्यार के आगे तूने हर खुशियाँ वारी।तेरे प्यार के आगे सारे जग की प्यार भी फिकी।।        माँ तेरे वगैर ,मेरा दर्द समझता कौन ।रातों को नींद  से जग कर लोरी फिर सुनता कौन ।खुद जग कर, सारी रात चैन की नींद सुलाता कौन ।।हसना, खेलना, गिरना- गिर कर चलना तूझसे सिखा माँ ।अब तो वो सब सिर्फ एक यादे बन कर रह गई माँ । तेरा मेरा बस कुछ पल का साथ था माँ, छनिक खुशियों का साथ  था माँ । आ के लूटा दी तूने मुझपर सारे जग की प्यार, फिर अकेले छोड़ गई मुझे इस संसार  ।। स्वर्ग सा एहसास था माँ, जब तक तेरा साथ था माँ । जीवन के सफर में ना अपनों से डरता था, ना सपनौ से डरता था। ना वर्तमान से डरता था, ना भविष्य से डरता था ।लेकिन तेरे बिना ,कदम -कदम पर ठोकरे खूब  खाता हूँ । गैरो की क्या कहें, अपनों से भी डरता हूँ ।। सोचा था, पल-पल नहीं, हर पल तेरा साथ होगा माँ ।दो-चार दिनों की नहीं, जीवन -मरन का साथ होगा माँ ।लेकिन किसने सोचा था कल को , पल-पल का नहीं,केवल  कुछ पलो का साथ था  तेरा माँ ।जीवन भर की क्या कहें, दो-चार दिनों का साथ था केवल तेरा माँ ।।एक सुखद एहसास था माँ, जब तक तेरा साथ था माँ ।गम तो थे ,मगर तेरी खुशियों के आगे कम थे। बातें  करने को बहुत थे, मगर समय बहुत कम थे।सपने बहुत थे, मगर राते बहुत कम थे।। अब तो केवल तेरी बातें याद दिलाती है, हमेशा साथ होने का एहसास कराती है।तेरी बताई राहे मुझको मंजिल की ओर बढ़ाती है।भीड़ भरी इस दुनिया में केवल तेरी यादें मुझे तनहाई से बचाती है। माँ अब तो जैसे बदल गया संसार मेरा।भीड़ भरी राहों में भी खुद को अकेला पाता हूँ ।सामर्थ्य भरी जिंदगी में खुद को असहाय पाता हूँ ।लज्जा भरी निगाहों में भी खुद को निरलज पाता हूँ ।निडर भरी जीवन में भी खुद को भयभीत पाता हूँ ।इमारतों से भरी इस शहर में खुद को बेघर पाता हूँ ।। एक सुखद एहसास था, तेरा जो साथ था माँ ।अब तो सुनी सुनी जग की सारी खुशियाँ, भीड़ भरी दुनिया मुझे लगती है  पराई,  एक तेरा ही चेहरा मुझको अपनों की याद दिलाती । एक सुखद एहसास था माँ

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